Sunday, February 21, 2010

रात के अंधेरों में,
रौशनी कि एक किरण को ढूँढा करते हैं|
दिन के उजालों में,
रात के अंधेरों कि आस मन में लिए फिरा करते हैं||

ग़मों के रेगिस्तान में,
ख़ुशी कि दो बूँद को तरसा करते हैं|
दो पल कि ख़ुशी मिल जाये,
तो उसके छीन जाने से डरा करते हैं||

दुनिया कि इस भीड़ में,
हम तन्हाई को तलब किया करते हैं|
पर अपनी ही तन्हाई से भाग कर,
हम दुनिया की भीड़ में छुप जाया करते हैं||

यूँ तो ये रूह भटकती है,
रात दिन मयखाने की तलाश में,
पर जो कोई राहगीर साकी मिल जाये,
बीच राह में, हाथ थाम कर,
मयखाने की गलियों में ले जाने को,
तो मुँह फेर कर राह बदल लिया करते हैं,
अकेले एक जाम की पनाहों में,
अश्क बहाने को||






7 comments:

Vivek said...

The lonliness, the sadness it all echoes in these beautiful lines... very deep and very true :-)

serendipity said...

loved it..esp the beginning and end..worth reading again n again

bindaasviti said...

lets have a poetry jam session some time :)
beautiful thoughts and words! i loved it...especially the last part...

"अकेले एक जाम की पनाहों में,
अश्क बहाने को||"

keep writing the good stuff :)

meeta said...

@Vivek thanx...my official morale booster :)..thanx a lot :)

meeta said...

@serendipity glad you liked it neerjaji..thanku :)

meeta said...

@viti hehe..Jam session i will fail miserably..but it would fun trying..lets try one of these days.. and thanx for the comment and appreciation.

Blue Panther said...

A nice take on how nothing satisfies us. :-)