अश्कों की ज़बां होती, अगर,
बिखर जाता रात का सन्नाटा,
टूटे कांच के टुकड़ों की तरह तितर बितर |
बयान कर पाते,
बिलखती रूह की दास्ताँ, अगर,
दे जातीं ज़ख्म इतनें,
चीर के रात का दमन,
चीखें इन आंसुओं की,
सुखा न पातीं जिन्हें मलहम कोई |
बहतें हैं, इसलिए ये आंसूं ,
गुपचुप अंधेरों में,
बहा ले जाने को,
रूह के इस दर्द भरे अफसाने को |
