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Wednesday, September 14, 2011

दौड़

जो ना मिला जीवन में,
पीछे उसके दौड़ते दौड़ते
ज़िन्दगी निकल जाती है
अंत में बस मुठी भर राख रह जाती है ||

पा लेने को तो,
सारा जहाँ है, 
पर अंत में सबके हिस्से 
बस छे ग़ज ज़मी ही आती है||

बैंक- बैलेंस, गाड़ी, बंगला, नौकर- चाकर...
चाह का अंत है नहीं कहीं |
पाने को ख़ुशी जीवन में
दो पल सुकून के ही काफी हैं ||






Tuesday, June 21, 2011

कुछ लम्हें सुकून के

रात में ढलती सुबह 
सुबह में गुम होती रात के बीच 
सपनों की रफ़्तार से भागती 
इस ज़िन्दगी में 
dhundhti हूँ कुछ लम्हें सुकून के |

सुबह सुबह दौड़ते हुए 
गरम टोस्ट और चाय की दो चुस्कियों में,
हडबडाहट में निगले 
माँ के प्यार से भरे लंच के डब्बे में,
शाम की काफ्फी के अरोमा से  
गुम होती दिनभर की थकान मे,
dhundhti हूँ कुछ लम्हें सुकून के |

कभी,
किताबों के पन्नो में छुपी कविता कहानियों में,
कभी,
दोस्तों के साथ बिताये लम्हों में,
कभी,
गानों की धुन में बहते हुए 
कभी,
रात के सन्नाटे में बहती हवा के स्पर्श में,
कभी,
मोंसून की पहली बारिश में भीगते हुए,
कभी,
अपनी छोटी से दुनिया से परे बसी विशाल दुनिया
देखने की कल्पनाओं में, 
dhundhti हूँ कुछ लम्हें सुकून के |


छोटी सी इस ज़िन्दगी में,
सब सपनों को जी जाने की
बहुत कुछ पाने और कर जाने की 
इस मह्त्वकान्षा की दौड़ में 
क्षणभर को थमकर
दूर से
दुनिया के इस समंदर में,
बहती अनगिनत जिंदगियों की धाराओं की 
छोटी छोटी खुशियों में 
dhundhti हूँ कुछ लम्हें सुकून के |





Thursday, November 11, 2010

नज़्म

के कहीं खो ना जाये राहगीर कोई,
फिर उन्ही राहों पर चलते चलते , 
जिनमे हम भटकते रहे उम्र भर
के मिल जाये किसी थके भटके राही को,
इनकी छाव में चंद लम्हों का सुकून 
इसलिए इन "नज्मों" में हमने अपने क़दमों के निशान छोडें हैं|

"मेरी ज़िन्दगी"

बढते हुए कभी
कभी थमे हुए, थके क़दमों से,
उठते हुए कभी
कभी गिर कर संभलते हुए,
उड़ते हुए कभी
कभी सहम के सिसक कर,
हँसते हुए कभी
कभी आसुओं का हाथ थामे,
खुशी के साथ कभी
कभी ग़मों की सिलाई से,

बुनती हूँ मै ताना बाना
एक नन्ही सी नज़्म का
जिसका नाम है
"मेरी ज़िन्दगी"
ओहड़े फिरुंगी जिसे
जब तक चलूंगी इस ज़मी पर
और छोड़ जाउंगी उतार कर
एक यादगार की तरह 
जिस दिन,
निकलूंगी फिर एक नयी दुनिया के सफ़र पर| 

Wednesday, May 19, 2010

निंदिया

दिन की रौशनी में,
दफ़न किये फिरते हैं, जिन यादों को दिल के किसी कोने में....

दुनिया के शोर के तले,
दबाये फिरते हैं, जिन तनहियों का शोर.....

छुपते फिरते हैं,
जिन मंज़रों से हम, दुनिया की इस भीड़ की ओट liye ...

फिर रूबरू होतें हैं उन्ही से, तनहा रातों में ,
जब फुस्फुता है सिरहाना कानो में फिर वाही बीतीं यादें,
जब मिलतीं हैं चादरों की सलवटों में छुपी वो यादें,
जो काँटों सी चुब कर,
करके आँखों को नम,

छोड़ जातीं हैं हमें इस इंतज़ार में की,
कब आकर थामेगी निंदिया रानी हमें,
और ले आएगी यादों की अँधेरे जंगल से परे
रौशनी के उजालों क तले|

Sunday, May 16, 2010


अश्कों की ज़बां होती, अगर,
बिखर जाता रात का सन्नाटा,
टूटे कांच के टुकड़ों की तरह तितर बितर  |

बयान कर पाते, 
बिलखती रूह की दास्ताँ, अगर,
दे जातीं ज़ख्म इतनें,
चीर के रात का दमन,
चीखें इन आंसुओं की, 
सुखा न पातीं जिन्हें मलहम कोई |

बहतें हैं, इसलिए ये आंसूं ,
गुपचुप अंधेरों में,
बहा ले जाने को,
रूह के इस दर्द भरे अफसाने को |